कुत्ते के बच्चें कुत्ते होते है, गदहे के बच्चें गदहे होते है, सूअर के बच्चें सूअर होते है, शेर के बच्चें शेर होते है, लोमड़ी के बच्चें लोमड़ी होते है, भेड़िये के बच्चें भेड़िये होते है, सियार के बच्चें सियार होते है ठीक इसी प्रकार हम सभी उस एक परमपिता परमेश्वर के बच्चें स्वयं ईश्वर है तथा ईश्वर(हनुमान, कृष्ण-राधा, ब्रम्हा-सरस्वती, विष्णु,-लक्ष्मी, शिव-पार्वती एवं राम-सीता) के जैसा कार्य करने के लिए प्रकृति के द्वारा बाध्य है किन्तु हमारें पूर्वजों ने हमें यह कभी नहीं बताया की हम सभी उस एक परमपिता परमेश्वर(ईश्वर) की संतान स्वयं ईश्वर है और हमें ईश्वर के जैसा कार्य करना चाहिए या ईश्वर के मार्ग पर चलना चाहिए या ईश्वर के अधूरे कार्य को पूरा करना चाहिए तथा किसी भी ईश्वर को अपने ईश्वर होने का घमंड नहीं होता है और इसलिए हम सभी अपने आप को एक साधारण मानव कहते है किन्तु यदि हमें यह ज्ञान ही नहीं है की हम स्वयं ईश्वर है तो यह हमारी अज्ञानता को प्रदर्शित करता है और आज हम अपने आप को एक साधारण मानव कहते-कहते वास्तव में एक साधारण मानव बनकर रह गए है तथा हनुमान जिनमें इतनी शक्ति थी की वह एक छलांग में सात-समुन्द्र पार कर सकते थे वह भी ज्ञान के अभाव में समुन्द्र के तट पर बैठकर यह सोच-विचार करने को मजबूर थे की वह सात-समुन्द्र को पार कैसे करें ? तथा हम सभी के अज्ञानता का लाभ उठाकर कुछ असामाजिक तत्वों ने बड़े ही चतुराई से एक ही मानव के आयु एवं कर्म के अनुसार भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं के रूपों के अनुसार मूर्ति या फोटो बना डालें तथा हमें अपने ही रूपों को धुप या अगरबत्ती से पूजा तथा भजन-कीर्तन करने के लिए बाध्य कर दिए तथा जो व्यक्ति इनके अनुसार पूजा तथा भजन-कीर्तन नहीं करते उन्हें नास्तिक कहने लगें, मैं यह नहीं कहता हूँ की हम सभी को देवी-देवताओं की पूजा या भजन-कीर्तन नहीं करना चाहिए बल्कि मैं तो यह कहता हूँ हम सभी को इन सभी देवी-देवताओं के परम भक्त बनना चाहिए और रोज नहीं बल्कि सदैव इनकी पूजा या भजन-कीर्तन करना चाहिए किन्तु उससे पहले यह जानना आवश्यक है हम सभी प्रकृति के द्वारा बाध्य होकर ईश्वर की तरह कार्य कैसे करते है तथा पूजा या भजन-कीर्तन का अर्थ क्या होता है तथा पूजा या भजन-कीर्तन कैसे करते है?
मानव अथवा ईश्वर
कोई भी व्यक्ति अपने जीवन में आयु, रूप एवं कर्म के अनुसार मुख्य रूप से चार युगों में निवास करते है तथा सर्व-प्रथम कलयुग में जन्म लेते है अर्थात पहला कल-युग मे लगभग 0-15 वर्ष की आयु में बालक अथवा हनुमान के रूप में जीवन निर्वाह करते है जो कर्म से ब्राम्हण या शूद्र होते है, दूसरा द्वापर-युग में लगभग 15-30 वर्ष की आयु युवा अथवा कृष्ण/राधा के रूप में जीवन निर्वाह करते है जो कर्म से शूद्र या वैश्य होते है, तीसरा त्रेता-युग में लगभग 30-45 वर्ष की आयु वयस्क अथवा राम/सीता के रूप में जीवन निर्वाह करते है जो कर्म से वैश्य या क्षत्रिय होते है तथा इसी युग में ब्रह्मा/सरस्वती के रूप में भी जीवन निर्वाह करते है एवं चौथा सत्य-युग लगभग 45-60 वर्ष की आयु वृद्ध अथवा शिव/पार्वती के रूप में जीवन निर्वाह करते है जो कर्म से क्षत्रिय या ब्राम्हण होते है, मानव तो एक ही है किन्तु आयु के अनुसार रूप एवं रूप के अनुसार कर्म एवं कर्म के अनुसार युग बदल जाते है।
कल-युग
सर्वप्रथम जब किसी व्यक्ति का जन्म होता है तो वह व्यक्ति अपने आयु, रूप एवं कर्म के अनुसार सर्वप्रथम कलयुग में निवास करते है एवं वह व्यक्ति बालक अवस्था में हनुमान(बंदर) का रूप होते है तथा बालक(हनुमान) को दादा(शिव) का अवतार भी कहते है और कोई भी व्यक्ति बालक(हनुमान) अवस्था में अपने माता-पिता(सीता-राम) की निस्वार्थ भाव से सेवा करते है अर्थात राम और सीता के लिए शूद्र अथवा दास या नौकर के रूप में निस्वार्थ भाव से कार्य करते है अब यदि अब कोई भी व्यक्ति यह कहते है की एक बालक को बंदर(हनुमान) का रूप नहीं कहते है या वह बालक(हनुमान) अपने माता-पिता(सीता-राम) की निस्वार्थ भाव से सेवा नहीं करते है या कोई बालक(हनुमान) अपने दादा(शिव) का रूप नहीं होते है तो संभव है यह सब वाक्य पूर्ण रूप से काल्पनिक एवं मिथ्या भ्रम है जिसका किसी भी धर्म, जाति, वर्ग, समुदाय या व्यक्ति से किसी भी प्रकार का कोई भी संबंध नहीं है।
द्वापर-युग
जब कोई व्यक्ति कलयुग से द्वापर युग में पहुँचते है अर्थात बाल अवस्था से युवा अवस्था में पहुँचते है तो कृष्ण के रूप में स्वयं विष्णु का अवतार होते है, कृष्ण का कार्य तो किसी से भी छिपा नहीं है, गोपियों के संग क्रीड़ा के अतिरिक्त और कोई इनका कार्य शेष नहीं है किन्तु यदि कोई कंश(राजा अथवा चोर) जो उसके घर से दूध(घन) की चोरी(टैक्स या कर के रूप में) करते है तो ऐसे कंश(राजा अथवा चोर) का विनाश स्वयं कृष्ण ही कर सकते है और यह कार्य किसी और के वश में नहीं है, यहाँ तक की यदि कोई व्यक्ति या समूह द्रौपदी जो कृष्ण की सखा थी उसके ऊपर आँख उठा कर देखे तो उनका विनाश कृष्ण ही कर सकते है, कृष्ण का एक और भी कार्य था कृष्ण दूध के लिए गायों को चराने जंगल में लेकर जाते थे अर्थात अपने श्रम के बदले में दूध(धन) प्राप्त करते थे अर्थात एक युवा अपना श्रम के बदले दूध(धन) कमाते है या कुछ युवा अपना स्वयं का रोजगार करते है दोनों ही प्रस्थति में व्यवसाय ही करते है और व्यवसाय करने वाले को वैश्य कहते है तथा जो व्यक्ति युवा अवस्था में किसी भी प्रकार का रोजगार नहीं करते है वह अपने माता-पिता की निस्वार्थ भाव से सेवा करते है।
त्रेता-युग
किसी भी अविवाहित व्यक्ति के लिए त्रेता-युग में पहुंचना असंभव है अतः जब कोई व्यक्ति द्वापर-युग से त्रेता-युग में पहुँचते है अर्थात युवा से वयस्क होते है अर्थात विवाह हो जाने के बाद राम के रूप में स्वयं विष्णु का अवतार होते है और यदि कोई सीता के ऊपर आँख उठाये तो रावण का वध स्वयं राम ही कर सकते है किन्तु सीता एवं राम स्वयं विष्णु तथा लक्ष्मी के अवतार ही नहीं बल्कि ब्रम्हा एवं सरस्वती के भी अवतार है, जब एक दंपत्ति अपने बच्चें को जन्म देते है तो पिता की योग्यता एवं समर्थ बच्चे का भविष्य निर्धारित करते है एवं एक माता अपने बच्चे को बोलना, चलना, लिखना, पड़ना इत्यादि जैसा प्रारंभिक ज्ञान प्रदान करती है और ज्ञान देने वाली को तो सरस्वती कहते है तथा पिता की योग्यता एवं सामर्थ ही बच्चें का भाग्य एवं भविष्य निर्धारित करता है और भाग्य लिखने वाले को तो ब्रम्हा ही कहते है, तथा राम के रूप में अपने परिवार की सुरक्षा करना तथा पालन पोषण करना क्षत्रिय के रूप में राम का कर्तव्य है और जो पालन करते है तो उन्हें विष्णु का अवतार ही कहेगे तथा एक गृहणी लक्ष्मी के रूप में धन की बचत करना अथवा धन को संग्रहित करना कर्तव्य है तथा धन को संग्रहित करने वाली को लक्ष्मी कहते है तथा चुकी राम का दाइत्व अपने परिवार की हर प्रस्थति में सुरक्षा प्रदान करना है तो सुरक्षा करने वाले को क्षत्रिय कहते है अर्थात जब मानव वयस्क हो जाते है तो वह क्षत्रिय बन जाते है।
सत्य-युग
किसी भी अविवाहित व्यक्ति या जिसकी अपनी संतान नहीं हो उसके लिए सत्य-युग में पहुंचना असंभव है अतः जब कोई दंपत्ति जिनकी अपनी संतान हो और वह त्रेता-युग से सत्य-युग में पहुँचते है तो वह अपना सबकुछ अर्जित किया हुआ ज्ञान एवं धन-संपत्ति अपने बच्चों को दान कर देते है तथा दान करने वाले माता-पिता स्वयं शिव एवं पार्वती का रूप होते है तथा दानी से बड़ा कोई ज्ञानी नहीं है और जो अपना सबकुछ अपने बच्चों को दान करके स्वयं अपने बच्चों से भिक्षा मांगकर खाते है वह अपने ब्राम्हण कर्तव्य का पालन करते है क्योकि एक ब्राम्हण के पास धन-संपत्ति नहीं होता है एवं एक ब्राम्हण सदैव निर्धन अथवा दरिद्र होता है और यदि होता है तो वह अपना सब कुछ अपनी संतान को दान करके भिक्षुक बन जाते है एवं भिक्षा आवंटन करके अपना जीवन निर्वाह करते है, कोई भी संतान अपने माता-पिता के धन-संपत्ति को किसी छल, दल या बल से ग्रहण अथवा कब्ज़ा कर सकता है किन्तु ज्ञान तो एक योग्य संतान को ही प्राप्त होता है और एक ज्ञानी के लिए धन-संपत्ति का कोई मूल्य नहीं क्योकिं ज्ञान से स्वयं धन-संपत्ति अर्जित किया जा सकता है किन्तु धन-संपत्ति से स्वयं ज्ञान को अर्जित नहीं किया जा सकता है।
पूजा का अर्थ
यदि कोई व्यक्ति, पूर्वज या ईश्वर जीवित नहीं है या जो व्यक्ति, पूर्वज या ईश्वर दिखाई नहीं दे रहें है तो हम उस व्यक्ति, पूर्वज या ईश्वर के मूर्ति या फोटो पर हार चढ़ाकर धुप या अगरबत्ती के साथ किसी तंत्र-मंत्र का जाप अथवा भजन-कीर्तन करते है और उसे हम सभी पूजा या भक्ति या सेवा करना कहते है किन्तु वास्तव में पूजा या भक्ति या सेवा का वास्तविक अर्थ उस मृत व्यक्ति, पूर्वज या ईश्वर अथवा जो व्यक्ति, पूर्वज या ईश्वर दिखाई नहीं दे रहें है उसके किसी अधूरे कार्य को पूरा करना अथवा उनके दिखाए हुए मार्ग पर चलना या उनके जैसा कार्य करना है और हनुमान से सर्वश्रेष्ठ भक्त का उदाहरण इस पृथ्वी पर दूसरा और कोई भी नहीं है अर्थात अपने माता-पिता, पूर्वज या ईश्वर की निस्वार्थ भाव से सेवा करना अथवा इनके किसी कार्य में सहयोग करना अथवा इनके किसी अधूरे कार्य को पूरा करना या इनके दिखाए हुए मार्ग पर चलना ही वास्तव में पूजा, भक्ति या सेवा है और यदि कोई व्यक्ति अपने माता-पिता, पूर्वज या ईश्वर के मार्ग पर नहीं चलते है या इनके अधूरे कार्य को पूरा नहीं करते है या इनके कार्य में सहयोग नहीं करते है तो ऐसे व्यक्ति के द्वारा अपने माता-पिता, पूर्वज या ईश्वर के मूर्ति या फोटो पर हार चढ़ाकर धुप या अगरबत्ती के साथ किसी तंत्र-मंत्र का जाप अथवा भजन-कीर्तन करना व्यर्थ है।